Breaking News

नेपाल बाढ़ के बाद चीन पर सवाल, तिब्बत की बैरियर लेक टूटने की सूचना में देरी का आरोप

नेपाल में बाढ़ त्रासदी के बाद चीन पर उठे सवाल, तिब्बत की बैरियर लेक टूटने की सूचना में देरी का आरोप

काठमांडू/रसुवा: नेपाल में आई बाढ़ और अचानक बढ़े जलस्तर के बाद अब चीन की ओर से समय पर सूचना साझा नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं। नेपाल में कई लोग और विशेषज्ञ आरोप लगा रहे हैं कि तिब्बत में बनी एक बैरियर लेक के टूटने की जानकारी समय रहते नेपाल को नहीं दी गई। उनका कहना है कि यदि नेपाल को समय रहते अलर्ट मिल जाता, तो सीमावर्ती इलाकों में राहत और बचाव की तैयारियां बेहतर की जा सकती थीं और नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता था।

मिली जानकारी के अनुसार, तिब्बत में एक बैरियर लेक में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो गया था। झील में पानी बढ़ने के बाद स्थिति गंभीर होती गई। आरोप है कि नेपाल को इसकी जानकारी उस समय मिली, जब झील टूटने की स्थिति बन चुकी थी या पानी का तेज बहाव नेपाल की ओर बढ़ चुका था।

चीन से समय पर सूचना नहीं मिलने का आरोप

रसुवा के प्रमुख जिला अधिकारी नरेंद्र परियार के अनुसार, उन्हें झील टूटने की जानकारी नेपाली सेना के माध्यम से मिली। उनका कहना है कि चीन के जल संसाधन मंत्रालय की ओर से इस संबंध में कोई सीधी सूचना साझा नहीं की गई।

बताया गया कि झील में पानी भरने के बाद ओवरफ्लो की स्थिति शुरू हुई। इसके बाद चीन ने तिब्बत में बचाव अभियान शुरू किया। लेकिन जब स्थिति और बिगड़ी तथा झील टूटने लगी तो अभियान रोक दिया गया। इसके बाद नेपाल की ओर से भी लोगों को संभावित बाढ़ के खतरे को लेकर अलर्ट किया गया।

इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच सीमा पार आपदा की पूर्व चेतावनी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

16 मिनट की देरी ने बढ़ाई चिंता

नेपाल के विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, बुधवार सुबह करीब 8:40 बजे भोटेकोशी नदी के जलस्तर का आंकड़ा भेजा गया था। इसके बाद 8:50 बजे का आंकड़ा उपलब्ध नहीं हो सका।

इसी दौरान तिब्बत की ओर से अचानक तेज पानी का बहाव नेपाल की तरफ बढ़ा। बताया गया कि नेपाल को इस गंभीर स्थिति की जानकारी करीब 16 मिनट बाद मिली। तब तक बाढ़ का पानी कई क्षेत्रों में अपना असर दिखाना शुरू कर चुका था।

आपदा प्रबंधन के लिहाज से पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में कुछ मिनटों की देरी भी बड़ी चुनौती बन सकती है। अचानक आने वाली बाढ़ में स्थानीय प्रशासन के पास लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, सड़कों को बंद करने और राहत दलों को सक्रिय करने के लिए बहुत कम समय होता है।

नेपाल में लोगों में बढ़ रहा आक्रोश

इस घटना के बाद नेपाल में चीन से समय पर सूचना साझा करने की व्यवस्था को लेकर नाराजगी सामने आई है। सीमावर्ती क्षेत्रों से जुड़े लोगों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे में नदी के जलस्तर, ग्लेशियर झीलों और बैरियर लेक जैसी घटनाओं की जानकारी पड़ोसी देशों के साथ तुरंत साझा करना बेहद जरूरी है।

भैरहवा के व्यवसायी अजय कुमार गुप्ता, भारत-नेपाल मैत्री संघ रुपंदेही के अध्यक्ष श्रीचंद गुप्ता, बुटवल उद्योग वाणिज्यिक संघ से जुड़े नवीन ढकाल और नवलपरासी निवासी कैलाश महतो ने भी समय पर सूचना साझा किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उनका कहना है कि अगर नेपाल को समय रहते खतरे की जानकारी मिल जाती, तो प्रशासन और स्थानीय नागरिक पहले से सतर्क हो सकते थे। इससे बाढ़ के प्रभाव और संभावित नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती थी।

भारत-नेपाल सीमा के लिए भी बड़ा खतरा

नेपाल में हुई इस घटना ने भारत-नेपाल सीमा से लगे भारतीय जिलों के लिए भी चिंता बढ़ा दी है। खासकर महराजगंज, कुशीनगर और सिद्धार्थनगर जैसे जिलों में नेपाल की तरफ से आने वाली नदियों और नालों के अचानक उफान पर आने का खतरा बना रहता है।

सीमा क्षेत्र में कई नदियां और जलधाराएं नेपाल से भारत की ओर आती हैं। मानसून के दौरान यदि नेपाल की तरफ किसी नदी या जलधारा का जलस्तर अचानक बढ़ता है और इसकी सूचना भारतीय प्रशासन को समय पर नहीं मिलती, तो सीमावर्ती गांवों और निचले इलाकों में खतरा तेजी से बढ़ सकता है।

नौतनवा और निचलौल समेत सीमा से लगे संवेदनशील क्षेत्रों में रियल टाइम जलस्तर निगरानी और तत्काल अलर्ट व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत भी इस घटना के बाद महसूस की जा रही है।

भारत, नेपाल और चीन के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था पर सवाल

हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ और अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए पड़ोसी देशों के बीच जलस्तर और मौसम संबंधी जानकारी साझा करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

बताया जाता है कि मानसून के दौरान भारत, चीन और नेपाल के बीच हिमालयी नदियों के जलस्तर से संबंधित विवरण साझा करने का प्रोटोकॉल मौजूद है। लेकिन स्थानीय स्तर पर इस व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ प्रोटोकॉल होना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि नदी के जलस्तर, अचानक बढ़े बहाव और झीलों के टूटने जैसी घटनाओं की रियल टाइम जानकारी संबंधित देशों और सीमावर्ती प्रशासन तक तुरंत पहुंचे।

सीमा क्षेत्रों में मजबूत करनी होगी अर्ली वार्निंग सिस्टम

नेपाल की इस त्रासदी ने भारत-नेपाल सीमा पर आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत को भी सामने ला दिया है। संवेदनशील क्षेत्रों में निम्न व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए:

  • नदियों के जलस्तर की 24 घंटे रियल टाइम निगरानी।
  • नेपाल की ओर से आने वाली नदियों के लिए स्वचालित सेंसर और निगरानी स्टेशन।
  • अचानक जलस्तर बढ़ने पर तत्काल SMS और सायरन अलर्ट।
  • सीमा के दोनों ओर जिला प्रशासन के बीच सीधा संपर्क।
  • मौसम और नदी संबंधी डेटा को तेजी से साझा करने की व्यवस्था।
  • संवेदनशील गांवों के लिए पहले से निकासी योजना।
  • मानसून के दौरान संयुक्त आपदा अभ्यास।
  • बैरियर लेक और ग्लेशियर झीलों की नियमित निगरानी।

सिर्फ नेपाल नहीं, भारत के लिए भी चेतावनी

नेपाल में सामने आया यह घटनाक्रम सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है। हिमालयी क्षेत्र में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं का प्रभाव सीमा पार कई किलोमीटर तक पहुंच सकता है। खासकर ऐसी नदियां जो नेपाल से भारत में प्रवेश करती हैं, उनके जलस्तर में अचानक वृद्धि भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

इसलिए नेपाल में हुई घटना को भारत के सीमावर्ती जिलों के लिए भी एक चेतावनी और सबक के रूप में देखा जा रहा है।

समय पर मिलने वाली सूचना आपदा को रोक नहीं सकती, लेकिन उससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, प्रशासन को तैयार करने और जान-माल के नुकसान को कम करने का मौका जरूर मिल सकता है।

निष्कर्ष

तिब्बत में बैरियर लेक टूटने के बाद नेपाल में उठे सवालों ने सीमा पार आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली की कमियों को सामने ला दिया है। नेपाल का आरोप है कि महत्वपूर्ण जानकारी समय पर साझा नहीं होने से तैयारियों के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला।

अब जरूरत इस बात की है कि भारत, नेपाल और चीन के बीच हिमालयी नदियों तथा संभावित बाढ़ की जानकारी साझा करने की व्यवस्था को केवल कागजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे रियल टाइम, तेज और भरोसेमंद प्रणाली में बदला जाए।

नेपाल की इस घटना से भारत-नेपाल सीमा के महराजगंज, सिद्धार्थनगर और कुशीनगर जैसे क्षेत्रों को भी सबक लेने की जरूरत है, ताकि भविष्य में अचानक आने वाली बाढ़ की स्थिति में लोगों को समय रहते सुरक्षित किया जा सके।


नोट: इस खबर में चीन की ओर से सूचना साझा करने में कथित देरी और उससे जुड़े आरोपों का उल्लेख उपलब्ध विवरण के आधार पर किया गया है। संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना चाहिए।

Tags: नेपाल बाढ़, चीन, तिब्बत, बैरियर लेक, भोटेकोशी नदी, भारत नेपाल सीमा, महराजगंज, सिद्धार्थनगर, कुशीनगर, Flood Alert, Himalayan Flood

कोई टिप्पणी नहीं